देवरस के इर्द–गिर्द चयनात्मक विस्मृति (Selective Amnesia) को समझना
भागवत द्वारा गोलवलकर को हटाया जाना समझा जा सकता था।
हमने 2006 में उनकी जयंती समारोहों के दौरान भी आरएसएस के हलकों में ऐसी ही असहजता देखी थी। उस समय एक ओर वे गोलवलकर के ‘योगदानों’ की प्रशंसा कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर वे ‘चुपके-चुपके उनकी छवि को साफ-सुथरा बनाकर उन्हें भोली-भाली जनता के सामने एक अधिक स्वीकार्य, मानवीय चेहरे के रूप में प्रस्तुत करने में लगे हुए थे।’
लेकिन देवरस को भी क्यों हटा दिया गया?
इस ‘ऐतिहासिक कार्यक्रम’ में उन्हें एक बार उल्लेख किए जाने योग्य भी क्यों नहीं समझा गया? उनका हटाया जाना और भी अधिक आश्चर्यजनक प्रतीत हुआ, क्योंकि अपने पूर्ववर्ती के विपरीत वे विवादास्पद नहीं रहे थे और उन्होंने हमेशा संगठन का अपेक्षाकृत सौम्य चेहरा प्रस्तुत करने का प्रयास किया था।
आरएसएस के विशिष्टतावादी दृष्टिकोण के आलोचक भी स्वीकार करते हैं कि यदि गोलवलकर संगठन को मजबूत संगठनात्मक और वैचारिक आधार देने वाले प्रमुख व्यक्तित्व थे, तो देवरस ने आरएसएस के विचार को उन वर्गों तक पहुँचाने में मदद की जिन्हें पहले बाहर रखा गया था। संघ के भीतर वे मुख्यतः आरएसएस के सामाजिक आधार का विस्तार करने और हिंदू समाज के सामाजिक रूप से वंचित वर्गों तक पहुँचने के लिए जाने जाते हैं।
जिस प्रकार 1954 में जिला प्रचारकों के सम्मेलन में गोलवलकर का भाषण आरएसएस के इतिहास में उनके संगठनात्मक और वैचारिक नेतृत्व को उजागर करने वाला एक ‘मील का पत्थर’ माना जाता है (Page 32, Khaki Shorts and Saffron Flags, Tapan Basu, Pradip Datta et al. Orient Longman, 1993), उसी प्रकार मई 1974 में पुणे में ‘सामाजिक समता और हिंदू चेतना’ पर देवरस का भाषण संघ के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ माना जाता है।
अपने भाषण में हिंदू संगठन की समस्या के लिए बाहरी लोगों—विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयों—को दोष देने के बजाय उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘हमारे बीच सामाजिक असमानता हमारे पतन का एक कारण रही है। जाति और उपजाति की प्रतिद्वंद्विता तथा अस्पृश्यता जैसी विघटनकारी प्रवृत्तियाँ इसी सामाजिक असमानता की अभिव्यक्तियाँ रही हैं।’
कोई भी व्यक्ति यह अंतर देख सकता था कि गोलवलकर और देवरस हिंदू असंगठन के कारणों को किस प्रकार देखते थे।
यह कहना ग़लत नहीं होगा कि गोलवलकर ने जाति व्यवस्था और उससे जुड़ी बहिष्करण की संरचना को यथावत रखते हुए हिंदू एकता का अधिक ‘असमावेशी/बहिष्करणवादी’ (exclusive) मार्ग अपनाया, जबकि देवरस ने हिंदू एकता का अपेक्षाकृत अधिक ‘समावेशी’ (inclusive) मार्ग अपनाया।
अपनी मृत्यु से मात्र चार वर्ष पहले गोलवलकर का मराठी समाचारपत्र ‘नवाकाल’ (1969) को दिया गया साक्षात्कार महाराष्ट्र में बड़े विवाद का कारण बना था, क्योंकि उसमें उन्होंने एक बार फिर मनुस्मृति की प्रशंसा की थी। जैसी कि पहले चर्चा की जा चुकी है, गोलवलकर को मनुस्मृति के विधानों के प्रति विशेष आकर्षण था।
ऐसा नहीं कि देवरस मनुस्मृति के विरोधी थे। उनकी जीवनी देखने पर पता चलता है कि उन्होंने न तो कभी इसकी निंदा की, न ही इस पर प्रश्न उठाया, और न ही जाति-उन्मूलन की बात की। लेकिन उन्होंने मूलतः अस्पृश्यता की निंदा की और इस बात पर ज़ोर दिया कि इसका पालन नहीं होना चाहिए, अन्यथा हिंदू एकता का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकेगा।
आरएसएस के बदलते वातावरण का पहला सार्वजनिक संकेत देवरस की 1973 में दीक्षाभूमि की यात्रा से मिला। यही वह स्थान है जहाँ आंबेडकर ने 1956 में अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। यही आंबेडकर थे जिन्होंने 25 दिसंबर 1927 को सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति का दहन किया था, क्योंकि वह जाति व्यवस्था का समर्थन करती थी।
यह भी याद रखना चाहिए कि देवरस के ही आग्रह पर आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन, भारतीय जनसंघ वगैरह, ऐतिहासिक बिहार आंदोलन (लोकप्रिय रूप से जेपी आंदोलन) में शामिल हुए थे, जिसके परिणामस्वरूप बाद में जनसंघ को गठबंधन सरकार में केंद्र में अल्पकालिक सत्ता मिली।
यह सवाल क्या वाजिब नहीं है कि संघ विस्तार में इतनी अहम भूमिका निभाने के बावजूद उनके ही जमात के लोगों ने देवरस को इस क़ाबिल क्यों नहीं समझा कि उनका नाम भी उन 32 व्यक्तित्वों की फ़ेहरिस्त में शामिल हो जिनका जिक्र मोहन भगवत ने किया था?
क्या इसका कारण यह था कि भागवत आपातकाल के दौरान संघ परिवार और उसके संबद्ध संगठनों की उस कम गौरवपूर्ण भूमिका पर चर्चा से बचना चाहते थे, जब देवरस सर्वोच्च नेता थे? ऐसी भूमिका, जो उस आधिकारिक इतिहास से भिन्न है जिसमें आरएसएस को उस दौर का महान और अडिग योद्धा बताया जाता है।
आपातकाल (1975) का लागू होना वास्तव में भारतीय लोकतंत्र का एक बहुत ‘अंधकारमय अध्याय’ था, जब जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े हज़ारों लोगों को जेल में डाल दिया गया था।
आज किसी सामान्य व्यक्ति के लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि जबकि आपातकाल के दौरान संघ परिवार के कार्यकर्ता जेलों में थे, उसके नेता, तपन बसु आदि के शब्दों में, ‘एक विचित्र द्वैत’ प्रदर्शित कर रहे थे। अपनी 1993 की पुस्तक Khaki Shorts and Saffron Flags (ओरिएंट लॉन्गमैन) में लेखक बताते हैं कि आरएसएस के शीर्ष नेताओं ने किस प्रकार प्रतिक्रिया दी। ‘आपातकाल के दौरान आरएसएस का रवैया एक विचित्र द्वैत को प्रकट करता है, जो 1948-49 के दिनों की याद दिलाता है।’
जबकि आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और संघ प्रमुख देवरस को जेल में डाल दिया गया था, उन्होंने भी 1948-49 में गोलवलकर की तरह ‘…शीघ्र ही आपातकालीन शासन से संवाद के रास्ते खोल लिए। अगस्त और नवंबर 1975 में उन्होंने इंदिरा गांधी को अत्यंत विनम्र पत्र लिखे, जिनमें आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को हटाने के बदले सहयोग का आश्वासन दिया गया था। उन्होंने विनोबा भावे को आरएसएस और सरकार के बीच मध्यस्थ बनने के लिए राज़ी करने की कोशिश की और संजय गांधी की सहायता भी चाही।’ (पृ. 52)
संघ के मुखपत्र पाञ्चजन्य (24 जुलाई 1977) में बापूराव मोघे ने भी स्वीकार किया था कि संघ प्रमुख द्वारा ऐसे पत्र लिखे गए थे। वकील और राजनीतिक टिप्पणीकार एजी नूरानी अपनी पुस्तक The RSS and the BJP (लेफ्टवर्ड, 2000, दिल्ली) में बताते हैं कि ये पत्र ‘18 अक्टूबर 1977 को महाराष्ट्र विधानसभा के पटल पर रखे गए थे।’
वे आगे लिखते हैं, ‘उन्होंने 22 अगस्त को प्रधानमंत्री को पहला पत्र लिखा, जिसमें स्वतंत्रता दिवस पर उनके भाषण (“संतुलित और अवसर के अनुरूप”) के लिए उन्हें बधाई दी और आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाने की प्रार्थना की। इसके बाद उन्होंने उन्हें इस बात पर भी बधाई दी कि “सुप्रीम कोर्ट के पाँच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव की वैधता को बरकरार रखा है” (11 नवंबर 1975)।’ (पृ. 31)
यह जोड़ना आवश्यक है कि यद्यपि श्रीमती इंदिरा गांधी ने वह मामला जीत लिया था, लेकिन यह निर्णय गुण-दोष के आधार पर नहीं बल्कि पूर्वप्रभावी संवैधानिक संशोधन के आधार पर हुआ था। इन पत्रों में देवरस ने फिर से आरएसएस बंदियों की रिहाई और संगठन पर लगे प्रतिबंध को हटाने की अपील की। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आरएसएस का बिहार और गुजरात के आंदोलनों से ‘कोई संबंध नहीं है।’
अंत में उन्होंने ‘राष्ट्रीय उत्थान’ के लिए ‘लाखों आरएसएस स्वयंसेवकों’ की सेवाएँ सरकार तथा गैर-सरकारी कार्यों के लिए देने की पेशकश भी की।
एक बात जिस पर शायद ध्यान न जाए, वह यह है कि इन पत्रों में संघ प्रमुख देवरस केवल आरएसएस की चिंता करते दिखाई देते हैं। अपने संगठन को एक निरंकुश शासन के प्रहार से बचाने के लिए वे यह घोषित करने को तैयार थे कि ‘यदि प्रतिबंध हटा लिया जाए तो उनके लोग शासन की सेवा में उपस्थित रहेंगे।’ उन्होंने न तो सभी बंदियों की रिहाई की माँग की और न ही आपातकाल हटाने की।
ऐसा प्रतीत होता है कि आरएसएस प्रमुख की एकमात्र समस्या यह थी कि उनके संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था; अन्यथा इंदिरा सरकार जो कुछ कर रही थी, वह उन्हें स्वीकार्य था।
जब श्रीमती इंदिरा गांधी अपने रुख से नहीं हटीं, तो संघ प्रमुख ने 16 जुलाई 1976 को एक और पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने ‘पाकिस्तान और चीन के साथ संबंध सुधारने के आपके प्रयासों’ की प्रशंसा की और यह भी कहा कि उन्हें उनके संगठन के बारे में गलत जानकारी दी गई है।
यह जाँच का विषय है कि विनोबा भावे जैसे लोगों की मध्यस्थता से देवरस और इंदिरा गांधी के बीच किसी प्रकार का समझौता हुआ था या नहीं। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि शीर्ष स्तर से आरएसएस कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया था कि वे जेल से रिहाई के लिए एक लिखित आश्वासन दें। वह आश्वासन इस प्रकार था—
‘श्री … बंदी वर्ग … कारागार शपथपत्र पर यह स्वीकार करता है कि मेरी रिहाई की स्थिति में मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करूँगा जो आंतरिक सुरक्षा और सार्वजनिक शांति के प्रतिकूल हो… मैं वर्तमान आपातकाल के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करूँगा।’ [Sanghachi Dhongbaji, Baba Adhav, Pune,1977]
प्रमुख समाजवादी कार्यकर्ता बाबा आढाव के अनुसार, देवरस ने स्वयं दिल्ली में एक प्रेस सम्मेलन में स्वीकार किया था कि उन्होंने इंदिरा गांधी को दो पत्र लिखे थे। समाजवादी आंदोलन के प्रमुख नेता मधु लिमये, जिन्होंने 19 महीने तीन जेलों में बिताए—जो आरएसएस प्रभाव वाले क्षेत्रों में थीं—आरएसएस बंदियों द्वारा लिखे गए क्षमायाचना पत्रों से परिचित थे।
यह समझा जा सकता है कि आरएसएस, जिसने अपनी विश्वदृष्टि (weltanshauung) ‘वीरता’ और ‘कायरता’ की दो अवधारणाओं के इर्द-गिर्द निर्मित की है, इस अतीत को भुलाना चाहेगी, जब अडिग प्रतिरोध दिखाने के बजाय उसने झुकना पसंद किया।
भागवत भली-भाँति जानते थे कि जैसे ही देवरस का उल्लेख होगा, कोई जिज्ञासु प्रतिभागी आपातकाल के दौरान उनके व्यवहार की व्याख्या माँग सकता है, और इससे कई असुविधाजनक प्रश्न उठ सकते थे।
लोग पूछ सकते थे कि अंडमान से शीघ्र रिहाई के लिए ब्रिटिश सरकार को दया याचिकाएँ भेजने वाले सावरकर, ब्रिटिश शासन द्वारा रखी गई शर्तों का पालन करने का निर्णय लेने वाले गोलवलकर, एक निरंकुश शासन के सामने झुककर अपने लोगों को बिना प्रश्न किए उसका अनुसरण करने को कहने वाले हेडगेवार तथा श्रीमती इंदिरा गांधी को अपने संगठन पर लगा प्रतिबंध हटाने के लिए पत्र लिखने वाले देवरस—ताकि वे और उनके लोग उनके द्वारा किए जा रहे ‘राष्ट्र-निर्माण’ के कार्य में शामिल हो सकें—इन सब में क्या अंतर है?
जब हेडगेवार ने बालासाहेब देवरस को भगत सिंह से ‘बचाने‘ के लिए सात दिन का अध्ययन वर्ग आयोजित किया?
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी शासन के सामने आरएसएस का नतमस्तक होना निश्चित रूप से परिवार के लिए एक ‘बुरी कहानी’ है, लेकिन शायद इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि मोहन भागवत के जनसंपर्क कार्यक्रम के दौरान लोगों के साथ उनकी महत्वपूर्ण बातचीत में उनका नाम क्यों नहीं आया।
शायद इसका मुख्य कारण यह है कि आरएसएस ने स्वयं को औपनिवेशिक-विरोधी जनसंघर्ष से अलग रखा और देवरस ऐसे व्यक्ति के रूप में उभरते हैं जो इस रुख से कभी सहज नहीं थे तथा जिन्होंने सर्वोच्च नेता के साथ अपने मतभेद स्वीकार करने में भी स्पष्टवादिता दिखाई।
बालासाहेब देवरस के युवावस्था से जुड़ा एक प्रसंग—जिसे उन्होंने स्वयं सुनाया है—इस बात का बड़ा अंतर उजागर करता है कि स्वतंत्रता संघर्ष के संबंध में आरएसएस क्या दावा करता था और वास्तव में क्या करता था। उल्लेखनीय बात यह है कि इसे स्वयं आरएसएस से जुड़े लोगों ने ही प्रकाशित किया है।
“जब हम कॉलेज में पढ़ते थे, तब हम भगत सिंह जैसे देशभक्तों के आदर्शों से प्रेरित महसूस करते थे। कई बार हमें ईमानदारी से लगता था कि भगत सिंह की तरह हमें भी कोई साहसिक कार्य करना चाहिए। आरएसएस के भीतर समकालीन राजनीति, क्रांति आदि विषयों पर, जो युवाओं को आकर्षित करते थे, अधिक चर्चा नहीं होती थी। इसलिए हम युवाओं का संघ की ओर आकर्षण कम हो गया था।
जब भगत सिंह और उनके साथियों को फाँसी दी गई, तो हम इतने उद्वेलित हुए कि हममें से कुछ ने घर छोड़कर अंग्रेजों को चुनौती देने के लिए कोई साहसिक कार्यक्रम शुरू करने का निर्णय लिया। हमें यह भी लगा कि डॉक्टर जी को बताए बिना हमें ऐसा कोई कठोर कदम नहीं उठाना चाहिए। मेरे मित्रों ने तय किया कि मैं डॉक्टर हेडगेवार को इसकी सूचना दूँ।
हम सब डॉक्टर जी से मिलने गए और मैंने उनके सामने अपनी योजना रखी। जब डॉक्टर जी ने यह महान योजना सुनी, तो उन्होंने हमें इस योजना की मूर्खता समझाने और संघ के कार्य की श्रेष्ठता का बोध कराने के लिए एक बैठक आयोजित की। यह बैठक सात दिनों तक सुबह से शाम तक और फिर रात 10 बजे से सुबह 3 बजे तक चलती रही।
डॉक्टर जी के गहन विचारों और उनके अमूल्य मार्गदर्शन को सुनकर हमारे विचारों और आदर्शों के प्रति हमारा दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया। उसी दिन से हमने अपनी अव्यावहारिक योजनाएँ छोड़ दीं और जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लिया। हमारे जीवन को नई दिशा मिली और हमारा मन स्थिर हो गया। (Smriti Kan, A compilation of anedotes from highly respected Dr Hedgewar’s life, RSS Prakashan Vighag, Nagpur – translated into English by SG)
इस बात में कोई आश्चर्य नहीं कि हेडगेवार ने देवरस को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने से ‘बचा’ लिया।
याद रखिए, यह पहली बार नहीं था जब देवरस ने ब्रिटिश शासन के प्रति आरएसएस नेतृत्व के समझौतापरक रवैये पर अपने मतभेद व्यक्त किए थे। अपनी पुस्तक The RSS: Icons of the Indian Right में लेखक निलंजन मुखोपाध्याय लिखते हैं कि,
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देवरस ने गोलवलकर से संपर्क किया और महात्मा गांधी के आंदोलन में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने आग्रह किया, “1931 में हेडगेवार ने परांजपे को संघ का दायित्व सौंपकर जंगल सत्याग्रह में भाग लिया था। आपने मुझे वास्तविक सरसंघचालक घोषित किया है और स्वयं को केवल कार्यवाहक बताया है। चूँकि आप पहले से ही संघ का संचालन कर रहे हैं, इसलिए मुझे भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने की अनुमति दीजिए, जबकि आप आरएसएस का कार्यभार संभाले रहें।”
लेकिन गोलवलकर संघ को अराजनीतिक बनाए रखने के अपने संकल्प पर अडिग रहे।
इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि महान तिलका मांझी (1757 ई.) के नेतृत्व वाले संघर्ष से लेकर ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन (1942) और रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (1946) तक, भारत में लगभग 200 वर्षों के ब्रिटिश शासन का विभिन्न स्तरों पर और समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा प्रतिरोध किया गया।
20वीं शताब्दी के पहले भाग में कांग्रेस के नेतृत्व में विभिन्न ब्रिटिश-विरोधी शक्तियों का एकीकरण हुआ, कम्युनिस्ट आंदोलन का उदय हुआ, और भगत सिंह तथा चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों के नेतृत्व में क्रांतिकारी आंदोलन विकसित हुआ, जिसने औपनिवेशिक शासन के सामने गंभीर चुनौती प्रस्तुत की। सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय सेना का उदय भी उसी काल का एक यादगार अध्याय है।
लेकिन इन सभी घटनाक्रमों और भारतीय जनता की स्वतंत्र होने की बढ़ती आकांक्षाओं ने भी हिंदुत्व विचारकों को अपने संगठनों को इस संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित नहीं किया।
वे हमें जो विश्वास दिलाना चाहते हैं, उसके विपरीत हिंदू सांप्रदायिकतावादियों और मुस्लिम सांप्रदायिकतावादियों के बीच कई समानताएँ हैं। वीर सावरकर और गोलवलकर जैसे नेताओं के नेतृत्व वाले हिंदू सांप्रदायिकतावादी हों या मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाला समूह—दोनों ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया।
ब्रिटिश शासन के प्रति उनका समर्थन इस तथ्य से भी स्पष्ट होता है कि हिंदू महासभा बंगाल और आज के पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन सरकारें चला रही थी।[3] उस समय हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी शाहिद सुहरावर्दी के नेतृत्व वाली सरकार में वरिष्ठ मंत्री थे, जबकि उनकी पार्टी के सर्वोच्च नेता सावरकर पूरे देश में सभाएँ कर युवाओं से ‘हिंदूकरण करो राष्ट्र का और सैन्यीकरण करो हिंदुत्व का’ के नारे के साथ ब्रिटिश साम्राज्यवादी सेना में भर्ती होने की अपील कर रहे थे।
जिस किसी ने भी स्वतंत्रता संग्राम का अध्ययन किया है, वह जानता है कि हिंदुत्व संगठनों, विशेषकर आरएसएस के लिए यह एक ‘कमज़ोर पक्ष’ था। इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है कि आरएसएस ने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया, बल्कि ‘हिंदुओं को संगठित करने’ पर ध्यान केंद्रित किया और अपने कार्यकर्ताओं को भी आंदोलन में शामिल होने से हतोत्साह किया।
वास्तव में उस उथल-पुथल भरे दौर में आरएसएस ने इतनी निंदनीय भूमिका निभाई कि आज उसके लिए अपनी निष्क्रियता का बचाव करना कठिन हो गया है। ऐसे असहज प्रश्नों से बचने के लिए वे या तो उस दौर के किसी नेता को अपना बताकर उसे हिंदुत्व के आदर्शों के निकट दिखाने का प्रयास करते हैं, या फिर संघर्ष में किसी अपेक्षाकृत छोटे पात्र को ‘वास्तविक नायक’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को धीरे-धीरे ‘जंगल सत्याग्रह के नेता’ के रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया भी इसी दिशा में दिखाई देती है।
शायद इस पूरे प्रसंग का विस्तार से अध्ययन करना आवश्यक है ताकि समझा जा सके कि यह कैसे किया जा रहा है।
हीरो हेडगेवार!
चार साल पहले केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने घोषणा की कि महाराष्ट्र के यवतमाल ज़िले के पुसद में 1930 के जंगल सत्याग्रह की स्मृति में एक नया संग्रहालय बनाया जाएगा। बताया गया कि इसे डॉ. के.बी. हेडगेवार को समर्पित किया जाएगा, ‘जिन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन के हिस्से के रूप में पुसद में आंदोलन का नेतृत्व किया था।’
इसमें कोई दो राय नहीं कि आरएसएस के पहले सरसंघचालक हेडगेवार और कुछ संस्थापक सदस्यों ने वास्तव में उपरोक्त सत्याग्रह में भाग लिया था। हेडगेवार को नौ महीने की जेल हुई थी, जिसे बाद में ब्रिटिश सरकार ने कम कर दिया था। लेकिन क्या महज़ इस आधार पर उनके नाम पर स्मारक बनाया जाना वाजिब होगा क्योंकि वह सिर्फ़ एक सहभागी थे और सत्याग्रह का आवाहन कांग्रेस और उससे जुड़े क्षेत्रीय नेताओं ने किया था !
इस स्मारक को उस परिचित तर्क के आधार पर उचित ठहराया गया था कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब उसने स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक नायकों की उपेक्षा की, जिसे मोदी-नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपने ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ के माध्यम से सुधार रही है।
लेकिन तथ्य इसके विपरीत हैं। जंगल सत्याग्रह का नेतृत्व नागपुर के वकील, स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस नेता एमवी अभ्यंकर, अमरावती के मराठी पत्रकार, नाटककार और स्वतंत्रता सेनानी वामनराव जोशी तथा शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी के संस्थापक एमएस ‘बापूजी’ अणे जैसे क्षेत्रीय नेताओं ने किया था। यही अणे बाद में गोलवलकर की अत्यंत विवादास्पद पुस्तक We or Our Nationhood Defined की प्रस्तावना भी लिखते हैं, जिसे आरएसएस आज भूल जाना चाहता है।
इस सत्याग्रह के आयोजन का उद्देश्य सरल था। यह गांधीजी की ऐतिहासिक दांडी यात्रा के समर्थन में ब्रिटिशों के उन दमनकारी वन कानूनों के विरोध का आंदोलन था, जो लोगों की जंगलों और वन उपज तक पहुँच को सीमित करते थे। महाराष्ट्र स्टेट गज़ेटियर्स (यवतमाल) इस आंदोलन का विवरण देते हुए लिखता है:
“देश के अन्य भागों की तरह बरार में भी वन कानून का उल्लंघन किया गया। एमवी अभ्यंकर और वामनराव जोशी को उनके विरोध के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। 10 जुलाई 1930 को बापूजी अणे ने ‘फॉरेस्ट सत्याग्रह’ का उद्घाटन करते हुए नेतृत्व संभाला। स्वयंसेवकों के एक दल के साथ उन्होंने यवतमाल के पुसद स्थित आरक्षित वन से घास काटीऔर गिरफ़्तार कर लिए गए। उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 379 के तहत ‘चोरी’ का आरोप लगाया गया और दोषी ठहराया गया… सत्याग्रह मध्य प्रांत और बरार में फैलने लगा। गोंड और अन्य आदिवासी समुदायों ने भी हज़ारों की संख्या में इसमें भाग लिया।”
इस इतिहास को देखते हुए क्या यह अधिक उचित नहीं होगा कि संग्रहालय अभ्यंकर, जोशी, हज़ारों आदिवासियों तथा अणे को समर्पित हो, जिन्होंने गांधीजी के नमक सत्याग्रह के समर्थन में विधान सभा से इस्तीफ़ा दे दिया था? इसे हेडगेवार की स्मृति को क्यों समर्पित किया जाए, जिन्होंने स्वयं अपने संगठन को आंदोलन में शामिल होने का आह्वान नहीं किया, बल्कि उत्सुक स्वयंसेवकों को भी सक्रिय रूप से इसमें भाग लेने से हतोत्साहित किया था?
हिंदुत्व के समर्थकों द्वारा लिखी गई हेडगेवार की जीवनियाँ भी इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि उन्होंने “संदेश भेजा कि संघ सत्याग्रह में भाग नहीं लेगा।” 1994 में सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित सीपी भिशीकर की पुस्तक संघ वृक्ष के बीज : डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को हेडगेवार की आधिकारिक जीवनी माना जाता है। इसमें उस समय संगठन की सोच का विस्तार से उल्लेख है। वे लिखते हैं,
“महात्मा गांधी ने लोगों से सरकार के विभिन्न कानूनों को तोड़ने का आह्वान किया था। गांधीजी स्वयं दांडी यात्रा करके नमक सत्याग्रह (37) शुरू कर चुके थे। डॉक्टर साहब [हेडगेवार] ने हर जगह संदेश भेजा कि संघ सत्याग्रह में भाग नहीं लेगा। हालाँकि जो लोग व्यक्तिगत रूप से भाग लेना चाहते थे, उन्हें रोका नहीं गया। इसका अर्थ यह था कि संघ का कोई भी जिम्मेदार कार्यकर्ता सत्याग्रह में भाग नहीं ले सकता था।”
हेडगेवार सत्याग्रह में आरएसएस के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत क्षमता में शामिल हुए। उद्देश्य यह था कि “उन्हें विभिन्न स्थानों के देशभक्त युवाओं से परिचित होने का अवसर मिलेगा… जिससे भविष्य में संघ के कार्यों के विस्तार में बहुत सहायता मिलेगी।” ये वाक्य Hedgewar: The Epoch Maker (38) के पृष्ठ 111 पर दर्ज हैं, जिसे 2021 में एचवी शेषाद्रि द्वारा संपादित और साहित्य सिंधु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया।
एनएच पालकर, जिन्होंने मराठी में हेडगेवार की जीवनी लिखी है और जिसकी भूमिका एमएस गोलवलकर, संघ के दूसरे सरसंघचालक, ने लिखी है, इस बात पर और प्रकाश डालते हैं कि हेडगेवार उन स्वयंसेवकों से क्या कहते थे जो आंदोलन में शामिल होना चाहते थे।
‘यदि तुम्हें दो वर्ष की सज़ा मिले, तो क्या तुम उसके लिए तैयार हो?’ जब युवक इस दंड को सहने की तैयारी दिखाते, तब डॉक्टर [हेडगेवार] कहते, ‘जब तुम अंग्रेजों की सज़ा भुगतने के लिए इतना समय देने को तैयार हो, तो संघ के काम के लिए इतना समय क्यों नहीं दे सकते?’
1974 में भारतीय विचार साधना, नागपुर द्वारा प्रकाशित श्रीगुरुजी समग्र दर्शन—एमएस गोलवलकर के हिंदी संकलित कार्य के चौथे खंड के पृष्ठ 39 और 40 पर भी एक ऐसा ही प्रसंग वर्णित है, जिसमें हेडगेवार के नेतृत्व में आरएसएस द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन से सचेत रूप से दूर रहने का उल्लेख है। ये सभी उदाहरण दिखाते हैं कि संघ नेतृत्व का समझौतापरक रवैया केवल जंगल सत्याग्रह तक सीमित नहीं था, बल्कि बाद के दौर में भी बना रहा।
हेडगेवार विश्व इतिहास के एक ऐसे विशिष्ट दौर में जीवित थे, जब पुराना सामंती उपनिवेशवाद टूट रहा था और एक नई दुनिया आकार ले रही थी। फिर भी वे हिंदुत्व की ‘गौरवशाली परंपराओं’ पर आधारित एक हिंदू राष्ट्र की कल्पना करते रहे, जिसमें मुसलमानों को ब्रिटिश उपनिवेशवादियों से भी बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना गया।
परिणामस्वरूप उन्होंने अपना पूरा जीवन अंग्रेजों के विरुद्ध उभरती हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ने में लगा दिया। जंगल सत्याग्रह में उनकी भागीदारी का उद्देश्य ब्रिटिश शासन का विरोध करना या औपनिवेशिक शासन के प्रति आक्रोश व्यक्त करना नहीं था, बल्कि क्षेत्र के युवाओं से संपर्क स्थापित करना और “उन्हें आरएसएस के दायरे में लाना” था।
संघ परिवार के समर्थक चाहे जो दावा करें, हेडगेवार की नई छवि उभारने की कवायद अंदर से खोखली है। उन्हें जंगल सत्याग्रह का नेता घोषित करना उन देशभक्तों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने जोखिम उठाया।
हक़ीक़त यही है कि संघ को औपचारिक तौर पर भी इस सत्याग्रह से दूर रखने के लिए सक्रिय हेडगेवार – जिनका मकसद कुछ युवकों को ‘संघ के दायरे में लाना था’ – देशभक्तों का उपहास करने में भी संकोच नहीं करते थे जो देश की स्वतंत्रता के लिए जेल गए थे। Hedgewar: The Epoch Maker के अनुसार उन्होंने कहा था,
“आजकल जेल जाना देशभक्ति का प्रतीक माना जाता है… जब तक इस प्रकार की क्षणिक भावना की जगह स्थायी समर्पण और निरंतर प्रयास नहीं आते, तब तक देश का उद्धार नहीं हो सकता।”
हमें ये सभी तथ्य जनता के सामने रखने चाहिए; ये सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं और स्पष्ट करते हैं कि प्रस्तावित संग्रहालय एक काल्पनिक विचार को समर्पित है। ऐसा गढ़ा हुआ अतीत इतिहास को जीवित नहीं करेगा, बल्कि आंदोलन के वास्तविक नेताओं को मौन कर देगा और उन्हें प्रभावी रूप से इतिहास से ग़ायब कर देगा। नागरिकों को सरकार से कहना चाहिए कि यदि हेडगेवार पर संग्रहालय बनना ही है, तो वह जनता के कर के धन पर नहीं बनना चाहिए।
जो लोग भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलना चाहते हैं, वे अपने संस्थापकों को महान नायकों के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। उनके प्रयास तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के उस कथन की याद दिलाते हैं, जो प्रसिद्ध लेखक-पत्रकार रामबहादुर राय के अनुसार जनसत्ता हिंदी समाचारपत्र (28 जून 2003) में प्रकाशित हुआ था:“हम स्वतंत्रता की बस पकड़ने से चूक गए।”
समाचारपत्र के अनुसार देवरस ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष के दौरान स्थापित होने के बावजूद आरएसएस स्वतंत्रता को निकट आता नहीं देख सका और “घटनाओं के प्रवाह से अभिभूत हो गया।”
शायद हिंदुत्व के समर्थकों को यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि वे वास्तव में बस चूक गए थे, क्योंकि वे एक अलग बस में सवार हो गए थे, जिसने उन्हें इतिहास के गलत पक्ष पर पहुँचा दिया।
और तमाम देशभक्त और क्रान्तिकारी ताक़तों का यह जिम्मा बनता है कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस विवादास्पद अतीत से पूरी तरह वाक़िफ़ रहे। उन्हें इस बात का बार-बार एहसास दिलाते रहने की ज़रूरत है कि अब आप कितनी भी क़वायद कर लें, इसमें अपना नाम दर्ज नहीं कर सकते हैं।
(पिछले साल मेनस्ट्रीम में प्रकाशित आलेख का संशोधित और सम्पादित रूप)
टिप्पणियाँ और संदर्भ :
1. आलोचकों का एक वर्ग ओक को एरिच वॉन डैनिकेन ( Erich Von Daniken ) 1936 – जनवरी 2026) का देसी संस्करण मानता था—स्विट्ज़रलैंड के उस नागरिक का, जिसने अनेक छद्मवैज्ञानिक पुस्तकें लिखीं। अपनी बहुचर्चित किताब ‘Chariots of Gods ‘ में डेनिकेन ने यह दावा भी किया कि हमारे पूर्वज बाहरी ग्रहों से यहाँ आये हैं। गौरतलब है कि डेनिकेन के विचार भी स्विस समाज में लोकप्रिय रहे हैं।
अमेरिकी खगोलविज्ञानी, विज्ञान के बहुचर्चित संप्रेषक कार्ल सेगन ने The Space Gods Revealed की प्रस्तावना में लिखा था :
डैनिकेन के लेखन जितना लापरवाह लेखन का, जिसका मुख्य सिद्धांत यह है कि हमारे पूर्वज मूर्ख थे, इतना लोकप्रिय होना हमारे समय की लोगों की सहज विश्वास करने की प्रवृत्ति और निराशा पर एक गंभीर टिप्पणी है।
मैं यह भी आशा करता हूँ कि ‘Chariots of the Gods?’ जैसी पुस्तकों की लोकप्रियता हाई स्कूल और कॉलेज के तर्कशास्त्र पाठ्यक्रमों में भी बनी रहे, ताकि उन्हें अव्यवस्थित सोच के उदाहरण के रूप में पढ़ाया जा सके। मुझे हाल के समय की ऐसी कोई पुस्तक ज्ञात नहीं है जो डैनिकेन की कृतियों जितनी तार्किक और तथ्यात्मक त्रुटियों से भरी हुई हो।
2 . ‘….[h]e established the RSS in 1925. He founded the Sangh in a remote, barren and forgotten part of Nagpur called Mohitewada…,’ Preface, Dr Keshav Baliram Hedgewar – by Rakesh Sinha, Publications Division, Government of India.
3 . Page 69, Rashtriya Swayamsevak Sangh, D R Goyal, Radha Prakashan, Delhi, Second edition, 2000 ; Page 16, Khaki Shorts and Saffron Flags, Tapan Basu, Pradip Datta et al. Orient Longman, 1993 ;
(तीन कड़ियों में प्रकाशित लेख की यह तीसरी और अंतिम कड़ी है। पहली और दूसरी कड़ी यहाँ और यहाँ पढ़ी जा सकती है।)